किराया माफ करने से कोर्ट का इनकार, कहा संकट में मकान मालिक भी हो सकते हैं



  • कोर्ट ने कहा, मकान मालिक के पास होता है, किराया माफ करने का अधिकार

  • कोरोना में किराएदारों को राहत देने वाली जनहित याचिका खारिज, 10 हजार जुर्माना भी लगा

  • हाई कोर्ट ने कहा कि अदालतें दूसरों के हितों की कीमत पर परोपकार नहीं कर सकती

  • अदालतें कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों में बहुत कम दखल देती हैं जो पक्षकारों ने मिलकर तय की हुई होती हैं


नई दिल्ली। एक वकील को दिल्ली के 'किरायेदारों' की तरफ से हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर करना भारी पड़ा। हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करने के साथ ही 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। वकील ने हाई कोर्ट से मांग की थी कि वह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकारों को इस्तेमाल करते हुए दिल्ली के सभी मकान मालिकों को आदेश दे कि वे बकाया किराया माफ कर दें और किराया न देने पाने के आधार पर अपने किरायेदारों को घर छोड़ने के लिए न कहें। हाई कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश देने से मना करते हुए कहा कि किराये में छूट देने, न देने का अधिकार मकान मालिकों के पास है, जो कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक उसे लेने के अधिकारी हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि अदालतें दूसरों के हितों की कीमत पर परोपकार नहीं कर सकती। चीफ जस्टिस डी एन पटेले और जस्टिस प्रतीक जलान की बेंच ने वकील गौरव जैन के जरिए दायर जनहित याचिका खारिज करते हुए कहा कि इसमें कोई मेरिट नहीं। उन्होंने दिल्ली के 'किरायेदारों' की तरफ से हाई कोर्ट के सामने कई मांगें रखीं। उनमें क्राइसिस के दौरान सभी किरायेदारों का किराया माफ करने, मकान मालिकों और किरायेदारों कें बीच विवादों के तुरंत निपटारे के लिए आयोग बनाने, इसमें मदद के लिए फंड गठित करने और इससे जुड़ी शिकायतों से निपटने के लिए स्टेंडर्ड ऑपरेटिंग प्रसीजर में संशोधन की मांगे शामिल थी। उनकी हर मांग को हाई कोर्ट ने कानून के पैमाने पर परखते हुए खारिज कर दिया। कहा कि दिल्ली के किरायेदारों की तरफ से दायर याचिका पूरी तरह से गलत और निराधार है। किराया माफ करने की सामान्य मांग मंजूर नहीं की जा सकती। पहला तो किराया माफ करने का अधिकार मकान मालिक के पास होता है जो कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक उसे लेने का अधिकारी है। अदालतें कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों में बहुत कम दखल देती हैं जो पक्षकारों ने मिलकर तय की हुई होती हैं। इस संकट से केवल किरायेदार ही नहीं मकान मालिक भी किराये पर आर्थिक रूप से निर्भर हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि हर केस से जुड़े तथ्यों को जाने बिना, रेंट देने और जगह खाली कराने से जुड़े किरायेदारों और मकान मालिकों के बीच के विवाद को अदालत निपटा नहीं सकती।