मेडिकल कचरे ने खोली फतेहपुर के अस्पतालों की कलई


फतेहपुर ब्यूरो। सरकारी अस्पतालों से निकलने वाला मेडिकल वेस्ट को निस्तारित करने में भले ही स्वास्थ्य विभाग ने निगरानी शुरू कर दी है, लेकिन अब भी निजी नर्सिंग होम से निकलने वाला मेडिकल वेस्ट आम लोगों की जिदगी जोखिम में डाल रहा है। निजी नर्सिंग होम मेडिकल वेस्ट निस्तारण को लेकर कागजी घोड़े दौड़ रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि कूड़े के ढेरों में पड़ा मेडिकल वेस्ट कलई खोल रहा है। शहर के कमोबेश हर नर्सिंग होम में हर तरह का उपचार होता है, फिर चाहे उसके पास उस उपचार को करने का अधिकार हो या नहीं। उदाहरण के तौर पर जिन नर्सिंग होम में के पास आपरेशन का अधिकार नहीं है वह भी बाहर से डॉक्टर बुलाकर आपरेशन कर देते हैं। रोगी टीबी, कैंसर, शुगर, हृदय या किसी भी असाध्य बीमारी का हो, इन नर्सिंग होमों में उपचार शुरू कर दिया जाता है। अंधेर तो यह है कि जिन 63 नर्सिंग होमों का पंजीयन स्वास्थ्य विभाग के पास है वह प्रतिवर्ष नवीनीकरण के दौरान अपने मेडिकल वेस्ट के निस्तारण का प्रमाण पत्र प्रयागराज स्थिति पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड से लेकर प्रस्तुत कर देते हैं। जबकि पूरे साल इन नर्सिग होम का मेडिकल कचरा जिले के ही अलग-अलग कूड़ा डंपिग स्थलों पर फेंका जाता है। जिन 250 नर्सिंग होमों के पास पंजीयन तक नहीं है उन्हें तो कोई कागजी खानापूरी नहीं करनी होती है। स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह से आंख बंद किए हुए है, शहर की हर गली व सड़क में नर्सिंग होम है। इनके पास क्या अधिकार है और यह सेहत सुरक्षा के क्या मानक पूर्ण करते हैं यह देखने के लिए चेकिग तक नहीं होती। जब कूड़ा खुले में पहुंच जाता है तो निमोनिया, हैजा, कालरा, डेंगू, स्वाइन फ्लू, मेनेंजाइटिस, हेपेटाइटिस- बी, टीबी व कैंसर जैसी बीमारियां भी फैला सकता है। हर नर्सिंग होम की जांच होनी चाहिए और वह अपना मेडिकल वेस्ट कहां निस्तारित करते हैं इसकी निगरानी की जानी चाहिए। ताकि नर्सिंग होम के आसपास व जगह-जगह पड़ने वाले कूड़ा में फेंका जाने वाला मेडिकल वेस्ट रोका जा सके। मेडिकल कचरा न सिर्फ पर्यावरण, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी चिता का विषय है। मेडिकल वेस्ट केवल शरीर को नहीं बल्कि वातावरण को भी दूषित कर रहा है। शहर में कूड़ों के ढेर में कबाड़ बीनने वाले बच्चे भी जाते हैं। उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।