कोरोना के बाद बेरोजगारी और भूख की चुनौती काफी बड़ी साबित होने वाली है


लेखकः वेदप्रताप वैदिक
भारत की दुविधा भी गजब की है। एक तरफ रेलें, मेट्रो, हवाई जहाज, दफ्तर, बाजार और कल-कारखाने खुल रहे हैं, दूसरी तरफ कोरोना की महामारी बढ़ती चली जा रही है। खुद भारत महामारी से महत्तम मारी की तरफ दौड़ लगा रहा है। इस दौड़ में उसने दुनिया के ज्यादातर देशों को मात कर दिया है। बस अमेरिका उसके आगे है। ब्राजील और भारत में संक्रमित लोगों का आंकड़ा 41 लाख के आस-पास जाकर बराबरी पर पहुंचा, लेकिन फिर भारत अपनी तेजी से ब्राजील को पीछे छोड़ता गया। यदि महामारी की रफ्तार भारत में इतनी ही तेज रही तो अमेरिका को पीछे छोड़ने में भी उसे ज्यादा देर नहीं लगेगी। इस समय भारत में प्रतिदिन संक्रमित होने वालों की संख्या एक लाख को छूने वाली है।
जांच की धीमी रफ्तार
इसमें शक नहीं कि इस महामारी का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार और सभी प्रांतों की सरकारें जी-जान से जुटी हुई हैं। कोरोना की जांच का आंकड़ा 10 लाख रोजाना तक पहुंच गया है। अब तक 5 करोड़ के आसपास लोगों की जांच हो चुकी है लेकिन 138 करोड़ की आबादी वाले देश में जांच की यह रफ्तार चलती रहे तो भी सबकी जांच करने में बरसों खप जाएंगे। उसके काफी पहले ही रोग-निवारक टीका आने की संभावना है। संतोष की बात यह है कि हमारे देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या प्रतिशत के हिसाब से बहुत कम है। यहां कोरोना से मरने वालों का प्रतिशत सिर्फ 1.7 है जबकि सारी दुनिया में 3.2 प्रतिशत है। जनसंख्या के हिसाब से अमेरिका में ज्यादा लोग मर रहे हैं। अमेरिका की जनसंख्या भारत की एक चौथाई है और वहां की स्वास्थ्य-सेवाएं भारत से कई गुना बेहतर हैं। फिर भी वहां ज्यादा अनुपात में लोग इसीलिए मर रहे हैं कि एक तो राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का रवैया काफी गैर-जिम्मेदाराना रहा है, दूसरे अमेरिकी जनता में आत्मविश्वास की अति भी इस रोग के फैलने का मुख्य कारण है। जैसे ट्रंप मुखपट्टी नहीं लगाते हैं, वैसे ही हजारों अमेरिकी नर-नारी समुद्र-तटों पर घूमते हुए नजर आते हैं। आत्मविश्वास की अति और लापरवाही हमारे यहां भी कम नहीं है। इसीलिए भारत में भी कई बड़े-बड़े नेता, फिल्मी सितारे, डॉक्टर और नर्सें भी कोरोना के जाल में फंस गए हैं।
फरवरी-मार्च में तो यह महामारी सिर्फ दिल्ली और मुंबई जैसे कुछ बड़े शहरों में दिखाई पड़ रही थी लेकिन अब वह कस्बों और गांवों तक फैल गई है। अचानक तालाबंदी की घोषणा के कारण शहर छोड़ कर अपने गांवों की तरफ भागते हुए मजदूर इसे अपने साथ लेते गए। अब ज्यों-ज्यों जांच उन तक पहुंच रही है, मरीजों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। लेकिन संतोष का विषय है कि इलाज़ से ठीक होने वालों की संख्या भी काफी अच्छी है। यदि भारत में 100 लोगों को कोरोना होता है तो उनमें से 76-77 लोग ठीक हो जाते हैं।
कोरोना के इलाज के लिए भारत में क्या-क्या नहीं हो रहा है। असरदार टीके (वैक्सीन) की खोज तो जोरों से चल ही रही है, आयुष मंत्रालय और अन्य कई आयुर्वेदिक संस्थानों ने तरह-तरह के सस्ते और सुलभ क्वाथ (काढ़े) जारी किए हैं। होम्योपैथी के डॉक्टर भी चुप नहीं बैठे हैं। लाखों-करोड़ों लोग आसन, प्राणायाम और व्यायाम के जरिए भी कोरोना का प्रतिरोध कर रहे हैं। क्या यह कम संतोष का विषय है कि टीके के बिना ही हमारे डॉक्टरों ने कोरोना की तात्कालिक काट कुछ हद तक निकाल रखी है। यह तो स्पष्ट है कि देश में कोरोना बढ़ रहा है लेकिन उसका डर घट रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो क्या लोग सड़कों, बाजारों, दफ्तरों, कारखानों, रेलों और बसों में दिखाई पड़ते?
सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 24 प्रतिशत की गिरावट हो गई है। कुछ आंकड़ों के अनुसार दो करोड़ लोगों की नौकरियां चली गई हैं और लगभग दस करोड़ लोग बेरोजगार हो गए हैं। दुनिया के कई अन्य मालदार देशों में, जहां यह महामारी भारत से अधिक जानलेवा रही है, वहां भी उनकी अर्थव्यवस्थाओं में 10-15 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट नहीं आई है। हमने ब्रिटेन को भी मात कर दिया है, जहां की जीडीपी की गिरावट 20 प्रतिशत है। लेकिन समृद्ध देशों की सरकारें गैर-सरकारी संस्थानों के कर्मचारियों की 80 प्रतिशत तनख्वाहें खुद दे रही हैं। भारत सरकार ने भी अपने वंचित वर्गों के लिए ‘बड़ी-बड़ी राहतों’ की घोषणाएं की हैं लेकिन वे ऊंट के मुंह में जीरा के समान ही हैं।
जेब खाली, पेट खाली
यह ठीक है कि अब बाजार खुलने लगे हैं और कारखाने चलने लगे हैं लेकिन ग्राहक कहां हैं? दुकानों का माल खरीदेगा कौन? लोगों की जेबें खाली हैं। देश में 70-80 करोड़ लोग तो ऐसे हैं, जिनके पेट भी खाली हैं। वे रोज कुआं खोदते हैं और पानी पीते हैं। यदि सरकार और समाज ने उनकी खबर नहीं ली तो देश में अराजकता फैलने में कोई कसर नहीं रहेगी। मरता, क्या नहीं करता? सिर्फ लफ्फाजी से काम नहीं चलेगा। इस वक्त जरूरी यह है कि लोगों के हाथ में पैसा पहुंचे ताकि वे खरीदारी कर सकें। सरकार शीघ्र ही आवश्यक कदम उठाएगी लेकिन सरकार से भी ज्यादा समाज की जिम्मेदारी है। कई गुरुद्वारे, मंदिर, जैन-संस्थाएं, मस्जिदें, गिरजे, संघ और समाजसेवी संस्थाएं उत्तम पहल कर रही हैं लेकिन राजनीतिक पार्टियां क्या कर रही हैं ? इनके 10-12 करोड़ सदस्य यदि दो-दो तीन-तीन परिवारों की जिम्मेदारी भी ले लें तो देश के ज्यादातर गरीबों और वंचितों को महामारी की मार से बचाया जा सकता है। समझ में नहीं आता कि हमारा खबरतंत्र, खास तौर से हमारे टीवी चैनल महामारी से लड़ने की बजाय अपनी सारी शक्ति किसी एक व्यक्ति की हत्या या आत्महत्या की पहेली को सुलझाने या उलझाने में क्यों लगे हुए हैं।