मध्यप्रदेश के छतरपुर से आई लॉकडाउन की सबसे वीभत्स तस्वीरः बेबस बेटियों ने मां को जंजीरों में जकड़ा



  • बदहाल बुंदेलखंड की बेदर्द दास्तां, भूख और गरीबी ने मां को विक्षिप्त बना दिया

  • मां को जंजीरों से बांधकर रखने को मजबूर हैं नाबालिग बेटियां

  • परिवार के पास खाने को कुछ नहीं, 5 दिन से भूखे हैं बच्चे

  • शासन या किसी जनप्रतिनिधि ने नहीं ली अब तक सुध


छतरपुर। एमपी के बुंदेलखंड में नाबालिग बच्चों द्वारा अपनी मां को जंजीरों में जकड़कर रखने का मामला सामने आया है। ताज्जुब यह है कि इन बेबस नाबालिग बच्चों को इसके लिए कोई गलत नहीं कह रहा और न ही कोई आरोप लगा रहा है। इन बच्चों ने पिछले 4-5 दिनों से खाना नहीं खाया है और न ही किसी ने इनकी भूख मिटाने में मदद की है। मामला मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले शहर मुख्यालय का है जहां 48 वर्षीय शीला कुशवाहा को उसकी ही नाबालिग बेटियों ने जंजीरों और रस्सियों से हाथ-पैरों को बांधकर रखा हुआ है। यह इन बेटियों की बेबसी है कि जन्म देने वाली को मजबूरन इस प्रताड़ना का शिकार होना पड़ रहा है। जानकारी के मुताबिक छतरपुर शहर के सिटी कोतवाली थानांतर्गत रहने वाली 48 वर्षीय शीला कुशवाहा के पति हलकाईं कुशवाहा ke 10 माह पहले बीमारी के चलते देहांत हो गया था। इसके बाद से परिवार की सारी जिम्मेदारी शीला के ही कंधों पर आ गई थी। वह मेहनत-मजदूरी कर जैसे-तैसे अपने बच्चों और बूढ़ी सास का पालन-पोषण कर रही थी। उसके परिवार में 80 वर्षीय बूढ़ी सास हरबाई कुशवाहा, तीन नाबालिग बेटियां 16 वर्षीय कविता, 14 वर्षीय मंजू, 8 वर्षीय कल्पना और 12 वर्षीय एक बेटा चंचल हैं। दो बड़ी बेटियों की शादियां हो चुकीं हैं जो अब अपने ससुराल में रह रहीं हैं। पिछले कई महीनों से लॉकडाउन के चलते काम-काज बंद होने से शीला मेहनत-मजदूरी को भी नहीं जा पा रही जिससे परिवार के भूखे रहने की नौबत आ गई। बच्चों का लालन-पालन, पढ़ाई-लिखाई, बूढ़ी सास का रख-रखाव और बेटियों के भविष्य की चिंता उसे खाये जा रही थी। इसी चिंता ने शीला पर मानसिक प्रहार कर दिया जिससे वह विक्षिप्तों जैसा व्यवहार करने लगी। अकेले बड़बड़ाते रहना, दिन-रात जागते रहना और खुद को नुकसान पहुंचाना उसकी दिनचर्या हो गई। बेबस बच्चे जैसे-तैसे मां को संभालते। वक्त गुजरने के साथ शीला की विक्षिप्तता बढ़ती गई। हालत यह हो गई कि उसने अपने कच्चे मकान का छप्पर गिराना शुरू कर दिया। इसमें वह खुद भी चोटिल हो गई। कोई उपाय नहीं देख बच्चों ने पड़ोसियों से मदद मांगी और मां को जंजीरों से जकड़ दिया ताकि वह खुद को और दूसरों को नुकसान न पहुंचा सकें। अब यही इनकी दिनचर्या हो गई है। न चाहते हुए भी शीला को इसी हालत में खाना-पीना देने के साथ उसकी देखरेख करना बच्चों के लिए सबसे बड़ा काम बन गया है। इधर, शीला के काम पर न जाने से परिवार की माली हालत और बिगड़ गई है। बूढ़ी सास कुछ करने लायक नहीं हैं। नाबालिग बच्चे अभी कमाने लायक नहीं हैं। सबके भूखों रहने की नौबत आ गई है और अब बच्चे घर में रखे सूखे चावल खाकर गुजर बसर कर रहे हैं। बाबजूद इसके इनकी मदद के लिए कोई भी नेता, अधिकारी, समाजसेवी, संस्थाएं या जनप्रतिनिधि आगे नहीं आ रहा है।