बिहार में कोरोना घोटाले की शिकार हुई गरीब मां, कोविड जैसे लक्षणों से बेटे की मौत लेकिन अस्पताल ने कराई ही नहीं जांच


  • बिहार में कोरोना घोटाले की शिकार हुई गरीब मां
  • कोरोना जैसे लक्षणों से बेटे की आरा सदर अस्पताल में मौत
  • लेकिन न तो इलाज के दौरान और न ही मौत के बाद अस्पताल ने कराई जांच
  • अब विधवा मां मुआवजे के लिए एड़ियां रगड़ने को मजबूर
आरा,(बिहार)। जरा सोचिए कि उस गुरबत की मारी महिला पर क्या गुजरती होगी जिसका पति एक साल पहले काल के गाल में समा गया। फिर हाल ही में उसके बेटे को कोरोना ने अपना शिकार बना लिया। लेकिन अब उसी बेटे की कोरोना से मौत साबित करने के लिए मां को सिस्टम के सामने एड़ियां रगड़नी पड़ रही हैं। 
पहले पति और अब बेटे को खो दिया
करीब एक साल पहले श्रमिक पति को खो दिया। इस साल कोरोना काल की दूसरी लहर में 30 साल का इकलौता कमाऊ बेटा भी कोरोना जैसे लक्षण से जिंदगी की जंग हार गया। अब विधवा मां को कोरोना से बेटे की मौत प्रमाणित करने के लिए सिस्टम से जंग लड़नी पड़ रही है। पीड़ित मां ने आरा सदर अस्पताल प्रबंधन और जिला प्रशासन से पत्राचार तक किया है लेकिन नतीजा सिफर।
यह दर्दभरी कहानी है भोजपुर जिले में अगड़ी जाति के एक गरीब परिवार की। परिवार में 56 वर्षीया विधवा मां के अलावा केवल 20 साल की जवान बेटी बची है। अब दोनों के भरण-पोषण के अलावा बेटी की शादी की चिंता भी विधवा मां को सता रही है। भोजपुर जिले के कोईलवर प्रखंड के नरही गांव के दक्षिणी हिस्से में पवन सिंह के घर में अजीब तरह की खामोशी है। इस घर में अब दो ही सदस्य मां और बेटी बच गई हैं जबकि दो पुरुष सदस्य पिता पवन सिंह और बेटे रवि की मृत्यु हो चुकी है।
घर में विधवा मंजू कुंअर अपनी बेटी खुशबू के साथ किसी तरह गुजारा कर रही हैं। बातचीत के क्रम में वह कहती हैं कि 'अब जीवन जीने की लालसा खत्म हो गई है पर केवल बेटी के लिए जी रही हूं। पति के मरने के बाद बेटे ने ढाढस बंधा जीने का दिलासा दिया था। लेकिन वो बहन की शादी की अंतिम इच्छा पूरी किए बगैर दुनिया को अलविदा कह गया।'
मंजू आगे कहती हैं 'आवास योजना का लाभ लेने के लिए दौड़ लगाते लगाते मेरा बेटा चल बसा। अब को कोई सहारा भी नहीं है। अभी तक बेटे की कोरोना से मृत्यु का प्रमाण पत्र तक नहीं मिल पाया।'
सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा कोरोना का शिकार हुआ रवि
पिता को खोने के बाद मुफलिसी में जी रहे अपने परिवार को सरकारी आवास योजना की छत दिलाने की जुगत में रविशंकर सिंह लगातार कोईलवर ब्लॉक में दौड़ लगा रहा था। आवास सहायक ने उसे इंदिरा आवास के पोर्टल में नाम डाले जाने की बात कही थी। कौन जानता था कि लाख प्रयास के बाद भी वह अपने घर का गृह प्रवेश भी नहीं कर पाएगा और खुद दुनिया को 30 साल की उम्र में ही अलविदा कह चला जाएगा।
आसपास के लोगों की मानें तो रवि नए घर से ही अपनी इकलौती बहन के हाथ पीले करना चाहता था। मां की ममता उसे जीने का हौसला दे रही थी, लेकिन कोरोना के लक्षण पर अस्पताल में भर्ती होने के बाद उसकी सांसों की डोर ही टूट गई। अब तो पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है यह विधवा मां और बेटी आखिर जाएं तो कहां जाएं और अपनी दर्द भरी दास्तां सुनाए तो किसे।
बेटे की मौत कोरोना से हुई पर मौत का सबूत कहां से लाये मंजू?
विधवा मंजू कुंअर को किसी ने बताया कि कोरोना से मौत पर सरकार की ओर से बतौर मुआवजे के रूप में चार लाख रुपये मिल रहे हैं। इस पर वह पूछती है कि वो कोरोना से बेटे की मौत का सबूत कहां से लाए? सांस लेने में हुई परेशानी के बाद 10 मई को मां ने अपने बेटे रविशंकर को आरा सदर अस्पताल में भर्ती कराया था।