दिल्ली पुलिस की अग्नि परीक्षा: 38 साल बाद 'स्पेशल सेल' में 'आईपीएस' की एंट्री, सात डीसीपी की हुई नियुक्ति


दिल्ली डेस्क।
आतंकियों, ड्रग्स के कारोबारी और गैंगस्टर, इन सबका 'काल' कही जाने वाली दिल्ली पुलिस की 'स्पेशल सेल' के लिए अब खुद 'अग्नि परीक्षा' देने का वक्त आ गया है। सेल के गठन के लगभग 38 साल बाद ऐसा पहली बार हो रहा है कि इस शाखा में एक नहीं, बल्कि तीन आईपीएस की एंट्री हुई है। यह तब है, जब दिल्ली पुलिस की कमान एजीएमयूटी कैडर से बाहर के आईपीएस राकेश अस्थाना को मिली है। अब सेल में कुल मिलाकर सात डीसीपी हो गए हैं। अभी तक सेल की कमान गैर-आईपीएस यानी दानिप्स (दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पुलिस सेवा) अधिकारी संभालते रहे हैं। दिल्ली पुलिस में यह सवाल चर्चा का विषय बना है कि आखिर स्पेशल सेल में सात डीसीपी लगाने का क्या मतलब है। क्या दिल्ली में सत्ता के केंद्र को लेकर खतरे का बड़ा खुफिया अलर्ट मिला है। क्या नए पुलिस आयुक्त 'सेल' को अपने हिसाब से मजबूती प्रदान कर रहे हैं। क्या उन्होंने 'सेल' में लंबे समय से तैनात अफसरों का 'आईपीएस' विकल्प तैयार करने की कवायद शुरू की है।
साल 2001 में मिला 'स्पेशल सेल' का नाम
बता दें कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, 1983 में महज 25 पुलिस कर्मियों की एक टीम होती थी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे अपने नोटिफिकेशन में 'ऑपरेशन सेल' का नाम दिया था। तब पंजाब में आतंकवाद का दौर चल रहा था। वहां के आतंकियों को पकड़ने के लिए इस सेल की मदद ली गई। स्पेशल सेल में 14 साल तक तैनात रहे डीसीपी एलएन राव (रिटायर्ड) बताते हैं, उस समय सेल को एसीपी हेड करता था। उसे क्राइम ब्रांच के डीसीपी को रिपोर्टिंग करनी होती थी। नब्बे के दशक में, खासतौर से बाबरी मस्जिद गिराए जाने की घटना के बाद 'सेल' का काम एकाएक बढ़ गया। एक विशेष समुदाय से जुड़े कुछ अलर्ट मिलने लगे। साल 2001 में इसे 'स्पेशल सेल' का नाम मिला था। दानिप्स अफसर को सेल में बतौर डीसीपी की कमान दे दी गई। मौजूदा स्पेशल सेल में चार डीसीपी (दानिप्स) काम कर रहे हैं। एक दक्षिणी रेंज, एक नॉर्दन रेंज, सेल की साइबर यूनिट और काउंटर इंटेलिजेंस डीसीपी तैनात हैं। इनमें संजीव यादव, प्रमोद कुशवाह, मनीषी चंद्रा और कमल मल्होत्रा, ये सभी दानिप्स अधिकारी हैं।
अब एक साथ 2009 बैच के आईपीएस जसमीत सिंह, 2010 बैच के राजीव रंजन और 2011 बैच के इंगित प्रताप सिंह को स्पेशल सेल में लगा दिया गया है। दिल्ली पुलिस के लिए यह एक बड़ा बदलाव है। दशकों के दौरान अनेक पुलिस आयुक्त आए और चले गए, मगर किसी ने सेल में आईपीएस अधिकारी को नहीं लगाया। दिल्ली पुलिस में ऐसी चर्चा चल पड़ी कि सेल में कुछ गलत तो नहीं हुआ है। वजह, सेल का अधिकांश कामकाज पर्दे के पीछे होता है, इसलिए कई बार इसके अफसरों पर कथित आरोप लगते रहते हैं। क्या नए पुलिस आयुक्त के पास कुछ ऐसी रिपोर्ट हैं कि उन्होंने सेल को बदलने का मन बना लिया। दूसरा, अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा होने के बाद पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद कश्मीर के अलावा क्या दिल्ली में भी कोई टारगेट तय कर सकता है। आतंकी संगठन 'आईएस' से जुड़े कई मामलों का खुलासा 'एनआईए' ने किया है। दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी बताते हैं कि सेल में भ्रष्टाचार की गुंजाइश बनी रहती है, क्योंकि वहां तैनात स्टाफ और अधिकारी पांच से 10 साल तक पोस्टिंग ले लेते हैं। हालांकि सेल में इस अवधि से अधिक समय तक की पोस्टिंग काटने वाले भी अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। अच्छा काम करने वालों को ‘आउट ऑफ टर्न’ प्रमोशन भी मिलता रहा है।
780 पदों की मंजूरी, लेकिन स्टाफ 1400
पूर्व डीसीपी एलएन राव के अनुसार, स्पेशल यूनिट में कार्यकाल तय नहीं होता। अनुभव को प्रमुखता दी जाती है। संभावित है कि पुलिस आयुक्त, नए 'आईपीएस डीसीपी' पर ज्यादा भरोसा जता रहे हों। उन्होंने सेल को ज्यादा सक्रिय बनाने का प्लान सोच रखा हो। ऐसे में रिप्लेसमेंट के लिए दो-तीन साल तो लग ही जाते हैं। इसे एक अच्छे कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए। सेल का अधिकारी रिटायर होता है या प्रतिनियुक्ति पर जाता है तो उस स्थिति में उनका विकल्प तैयार रहे। 'सेल' की भूमिका कितनी अहम है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें 780 पदों की सैद्धांतिक मंजूरी है, जबकि मौजूदा समय में लगभग 1400 का स्टाफ कार्यरत है। सेल ने खुद को साबित किया है। पिछले दिनों छह आतंकी पकड़े गए थे। उससे पहले हजारों करोड़ रुपये की ड्रग्स पकड़ी गई। गैंगस्टर जितेंद्र गोगी या काला जठेरी को सलाखों के पीछे पहुंचाना, लालकिला हिंसा मामले के आरोपी को दूसरे राज्य से पकड़ लाना, ऐसी बहुत सी उपलब्धियां 'स्पेशल सेल' के खाते में दर्ज हैं। बतौर एलएन राव, आईपीएस की एंट्री से 'स्पेशल सेल' में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे।