दिल्ली के पूर्व पुलिस अफसरों की राय, 'पुलिसिंग में बदलाव से लोगों और पुलिस दोनों का फायदा'


दिल्ली ब्यूरो। थाना स्तर पर दिल्ली पुलिस के कामकाज में बुधवार से एक नया और बड़ा बदलाव शुरू हुआ है। पीसीआर के ग्राउंड स्टाफ और उनकी गाड़ियों को थानों के साथ अटैच करके फोर्स और संसाधनों की कमी दूर करने की कोशिश की गई है। साथ ही थाना स्तर पर लॉ एंड ऑर्डर और इन्वेस्टिगेशन के काम के लिए अलग-अलग टीमें बनाकर पुलिसिंग को बेहतर बनाने का प्रयास शुरू किया गया है।
दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर अजयराज शर्मा का कहना है कि लॉ एंड ऑर्डर और इन्वेस्टिगेशन को अलग-अलग करने की बात कई सालों से चल रही थी। नैशनल पुलिस कमिशन से लेकर कई अन्य कमिटियों और अदालतों ने भी इसका सुझाव दिया था। काफी समय से इसकी जरूरत भी महसूस की जा रही थी। उन्होंने कहा कि ऐसे में उम्मीद है कि यह बदलाव आम जनता और पुलिस, दोनों के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। जहां तक पीसीआर के स्टाफ को थानों के साथ अटैच करने का सवाल है, तो उसमें यह देखना पड़ेगा कि कंट्रोल रूम से मिलने वाली कॉल पर अब वे कितनी जल्दी रिस्पॉन्ड करते हैं।
पूर्व कमिश्नर टी.आर. कक्कड़ का मानना है कि पुलिसिंग में जो बदलाव किए जा रहे हैं, उनके पीछे मकसद तो बहुत अच्छा है और नीयत भी सही है, लेकिन ये बदलाव पुलिस और पब्लिक, दोनों के लिए तभी फायदेमंद साबित होंगे, जब पुलिसवालों के एटीट्यूड में बदलाव होगा। कक्कड़ का मानना है कि लॉ एंड ऑर्डर हमेशा से पुलिस के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता और चुनौती रही है। उसे लेकर पुलिस की ही नहीं, बल्कि सरकार की भी एक जवाबदेही रहती है। ऐसे में यह भी देखना होगा कि नए बदलावों की वजह से लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करने के काम में कोई अड़चन तो नहीं आएगी। इसका जवाब कुछ महीनों बाद मिलेगा।
दिल्ली पुलिस के सभी प्रमुख विभागों की अगुवाई कर चुके रिटायर्ड स्पेशल कमिश्नर दीपक मिश्रा का कहना है कि यह एक बहुत अच्छा प्रयोग है और इससे जनता और पुलिस, दोनों का भला होना चाहिए। यह ऐतिहासिक है। सिस्टम को बदलना आसान काम नहीं होता है। इसके लिए अपनी फोर्स पर पूरा भरोसा होना चाहिए। इस लिहाज से यह एक बेहद सराहनीय प्रयास है। इससे लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करने में आसानी होगी। जांच अधिकारियों को अपना पूरा ध्यान जांच पर केंद्रित रखने का मौका मिलेगा।
'तालमेल से काम करने पर बेहतर नतीजे मिलेंगे'
एक अन्य रिटायर्ड पुलिस कमिश्नर का मानना है कि पीसीआर के स्टाफ को थाने में मर्ज करने की बजाय अगर दोनों विभागों को साथ लेकर बेहतर आपसी तालमेल के साथ काम करने का प्रयास किया जाए, तो ज्यादा बेहतर नतीजे मिल सकते हैं। हर चीज ब्लैक एंड वाइट नहीं होती है। कई बार बीच का रास्ता निकालकर चलना पड़ता है। पीसीआर और जिले के डीसीपी मिलकर तय करें कि कहां पर मिलकर पेट्रोलिंग करने की जरूरत है, कहां दोनों एक-दूसरे के सहायक बन सकते हैं और किस तरह एक दूसरे की जवाबदेही तय की जा सकती है। पीसीआर की मॉनिटरिंग और जिला पुलिस की ग्राउंड नॉलेज का समावेश करने से अच्छे नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। साथ ही ग्राउंड लेवल स्टाफ को मोटिवेट करना बेहद जरूरी है। तभी ग्राउंड लेवल पर सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।