हादसे ने छीन लिए दोनों हाथ, पैर से सरिता की चित्रकारी देख दंग रह जाते हैं लोग,राष्ट्रपति पुरस्कार से हो चुकी हैं सम्मानित


प्रयागराज ब्यूरो। कहते हैं हौसले अगर बुलंद हों और मन में कुछ अच्छा करने की चाहत तो आपकी शारीरिक दिव्यांगता कभी भी आपके आड़े नहीं आती। ऐसा ही है प्रयागराज की रहने वाली सरिता द्विवेदी के साथ जो 4 साल की उम्र में एक हादसे में अपने दोनों हाथ और एक पैर गंवा चुकी हैं। सरिता ने अपनी जिंदगी में कभी निराशा को आने नहीं दिया और अपनी कमजोरी को ही अपना हथियार बना लिया। अपनी जिंदगी के शौक है को असल जिंदगी में उतार लिया। सरिता को बचपन से आर्ट बहुत पसंद था।
अपने दो हाथ और एक पांव गंवाने के बाद भी सरिता ने अपने शौक को जारी रखा। वह अब भी अपने मुंह में ब्रश दबाकर दाहिने पैर की उंगलियों के सहारे कैनवास पर रंग भरती हैं। सरिता के इस हुनर को को देख लोग दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं।
बचपन के हादसे को आज भी नहीं भूलीं
प्रयागराज मण्डल फतेहपुर की रहने वाली सरिता के पिता विजयकान्त द्विवेदी भूतपूर्व सैनिक हैं। सरिता की प्रारंभिक शिक्षा प्रयागराज के केंद्रीय विद्यालय ओल्ड कैंट से हुई। सरिता ने अपने पढ़ाई के दौरान कभी खुद को दिव्यांग नहीं समझा। सरिता का यही हौसला उसकी जिंदगी में रंग भरने का काम करता था। सरिता आज भी आपने उस लम्हे को नहीं भूल पाती जब वह 4 साल की थीं और खेलने के दौरान उन पर हाईटेंशन तार गिर गया था। सरिता का आधा शरीर इसकी जद में आ गया था।
यही वजह रही कि कई सर्जरी से गुजरने के बाद डॉक्टर ने तो सरिता की जान बचा ली लेकिन इस हादसे ने उसके दोनों हाथ और एक पैर हमेशा के लिए छीन लिया। सरिता बोलते-बोलते भावुक हो जाती हैं और कहती हैं, 'मेरे माता-पिता ने उम्मीद के साथ हौसलों के रंग जो मेरी जिंदगी में भरे हैं, वह मेरी जिंदगी में एक मीठे सपने की तरह हैं जिसे मैं कभी भुला नहीं सकती। मां ने मुझे एक सामान्य बच्चे की तरह ही पाला और हमेशा आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित करती रहीं। सरिता ने बताया कि पिता सेना के उन वीरों की अक्सर सच्ची कहानियां सुनाते ताकि मैं अपने को कभी दिव्यांग न समझूं। यही हिम्मत थी जो मेरी जिंदगी में मुझे अच्छा मुकाम हासिल हुआ।
राष्ट्रपति पुरस्कार से हो चुकी हैं सम्मानित
जिंदगी में कुछ कर जाने की क्षमता को देखते हुए सरिता को 14 साल की उम्र में 2006 में राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रीय पुरस्कार ‘बालश्री’ से नवाजा। साल 2008 में उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने इन्हें इम्पावरमेंट ऑफ पर्सन विद डिसेबिलिटीज अवार्ड से नवाजा। साल 2009 में मिनिस्ट्री आफ इजिप्ट ने इंटरनैशनल अवॉर्ड और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला और देश की पहली महिला जस्टिस लीला सेठ ने सरिता को गॉडफ्रे फिलिप्स नेशनल ब्रेवरी अवार्ड से सम्मानित किया है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीएफए की डिग्री हासिल कर चुकीं सरिता शिक्षा से लेकर कला क्षेत्र में कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं। वर्तमान में सरिता भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम (एलिम्को) में नौकरी करती हैं। सरिता को आत्मनर्भर और सशक्तिकरण से जोड़कर भी देखा जाता है और यही सारी बातें सरिता को समाज में अलग करती है और आज के महिला पीढ़ी के लिए एक मिसाल की तरह है।