अखबारों ने नगर निगम विकास कार्यों के विज्ञापन छपने किए बंद, उत्तरी नगर निगम में प्रशासनिक नाकामी का बड़ा मामला!


  • विज्ञापन एजेंसियों ने रोका उत्तरी दिल्ली नगर निगम का काम
  • लंबे समय से भुगतान नहीं होने की वजह से रोका गया काम
  • सामने आयी बीजेपी नेतृत्व की प्रशासनिक समझ की अक्षमता
नई दिल्ली डेस्क। उत्तरी दिल्ली नगर निगम में पार्षदों को क्षेत्रीय विकास के लिए मिला 50 लाख रूपये का पार्षद फंड खतरे में पड़ गया है। विज्ञापन एजेंसियों ने अखबारों में विकास कार्यों के टेंडरों (एनआईटी) के विज्ञापन छापने से मना कर दिया है। इसके बाद प्रेस एवं सूचना (पी एंड आई) विभाग ने सभी विभागों को एक पत्र लिखकर इसकी सूचना जारी कर दी है। इसके बाद पार्षदों को मिले 50 लाख रूपये का बजट उनके इलाकों मे लग पाने पर सवालिया निशान लग गये हैं। कारण है कि कुछ महीने बाद ही नगर निगम के चुनाव होने हैं, ऐसे में सत्ताधारी दल सहित सभी पार्षदों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
खास बात यह है कि उत्तरी दिल्ली नगर निगम लंबे समय से आर्थिक संकट में चला आ रहा है, विज्ञापन एजेंसियों का भारी-भरकम बिल नगर निगम की ओर बकाया है। लेकिन प्रशासनिक नाकामी का ऐसा मामला पहली बार सामने आया है, जब टेंडर्स के विज्ञापन ही छपना बंद हो गये हों। नगर निगम के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब पी एंड आई विभाग ने विकास कार्यों के विज्ञापन छपने के लिए भेजे, लेकिन विज्ञापन एजेंसियों ने अपने बकाया की मांग करते हुए यह विज्ञापन छपवाने से इनकार कर दिया। बताया जा रहा है कि जब विज्ञापन एजेंसियों के प्रतिनिधियों को प्रेस एवं सूचना विभाग के मुखिया ने धमकाने की कोशिश की तो उन्होंने अपने बकाया राशि की उगाही के लिए कोर्ट जाने की तक की धमकी दे दी है।
बताया जा रहा है कि विज्ञापन एजेंसियों के प्रतिनिधियों की एक बैठक उत्तरी दिल्ली के निगम आयुक्त संजय गोयल के साथ भी करायी गई, लेकिन विज्ञापन एजेंसियां टस से मस होने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके पश्चात मामले को संभाल नहीं पाने के चलते पी एंड आई डिपार्टमेंट के डिप्टी कमिश्नर को तगड़ी झाड़ लगाई है। एक विज्ञापन एजेंसी के प्रतिनिधि का कहना है कि बीते दो साल से उनका भुगतान नहीं किया गया है, पिछले दिनों केवल पांच-पांच लाख रूपये हर एजेंसी को जारी किये हैं, जबकि एजेंसियों का बकाया करोड़ों में है। ऐसे में नगर निगम की और उधारी नहीं की जा सकती, क्योंकि अब कुछ निगम अधिकारी उनसे कमीशन की मांग कर रहे हैं।
बता दें कि उत्तरी दिल्ली नगर निगम में कुल 6 विज्ञापन एजेंसियां इंपैनल्ड हैं। अखबारों में छपने वाले सभी विज्ञापन इन्हीं एजेंसियों के जरिये ही जाते हैं। यह एजेंसियां डिजाइनिंग से लेकर अखबार में प्लेसिंग तक की सभी जिम्मेदारियां संभालती हैं। तय समय-सीमा के अंदर अखबारों को उन विज्ञापनों का भुगतान कर दिया जाता है, लेकिन एजेंसियों को उन विज्ञापनों का भुगतान नगर निगम की ओर से बाद में मिलता है। इस तरह लंबे समय से इन विज्ञापन एजेंसियों का बकाया लगातार बढ़ता जा रहा है। एक विज्ञापन एजेंसी के प्रतिनिधि ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि नये आये कुछ अधिकारियों का व्यवहार इतना ज्यादा खराब है कि उनके साथ काम ही नहीं किया जा सकता।
उत्तरी दिल्ली नगर निगम के प्रेस एवं सूचना विभाग ने अपने यहां इंपैनल्ड विज्ञापन एजेंसियों को हाल ही मे तीन एनआईटी के विज्ञापन अखबारों में छपवाने के लिए भेजे थे। इनमें से एक- कस्तूरबा हॉस्पिटल, दूसरा- आरपी सेल और तीसरा- सिविक सेंटर के प्रोजेक्ट (इलेक्ट्रिल) का था। लेकिन ऐजेंसियों ने तीनों विज्ञापनों को छपवाने से मना कर दिया। इसके पश्चात प्रेस एवं सूचना विभाग ने संबंधित विभागों को सूचित करते हुए समस्या का समाधान होने तक एनआईटी के छपवाने से मनाही की सूचना का पत्र जारी कर दिया है।
नगर निगम के इतिहास में पहली बार टेंडर के विज्ञापन छापने से विज्ञापन एजेंसियों द्वारा हाथ खड़े किये जाने से एक ओर निगम अधिकारियों की प्रशासनिक क्षमता पर सवालिया निशान लग गये हैं, दूसरी ओर सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व की प्रशासन को संभाल पाने में अक्षमता भी सामने आ गयी है। प्रदेश भारतीय जनता पार्टी की कमान आदेश गुप्ता के हाथों में है और वह उत्तरी दिल्ली नगर निगम में ही निगम पार्षद हैं। खास बात यह है कि वह उत्तरी दिल्ली के महापौर रह चुके हैं, अतः उन्हें प्रशासनिकम काम-काज के तौर-तरीकों की भी जानकारी है। इसके बावजूद उनके नेतृत्व में नगर निगम में निगम पार्षदों के पार्षद फंड उपयोग पर सवालिया निशान लग गये हैं।
उत्तरी दिल्ली नगर निगम के प्रेस एवं सूचना विभाग के डिप्टी कमिश्नर (निदेशक) जितेंद्र कुमार जैन से जब इस मामले में जानकारी मांगी गई तो उन्होंने हमेशा की तरह अपने विभाग के दूसरे लोगों से संपर्क करने के लिए कहा। ऐसा पहली बार नहीं है, जब प्रेस एवं सूचना निदेशक ने कोई भी सूचना मांगने पर किसी और से संपर्क करने के लिए कहा हो, इससे पहले भी वह यही करते रहे हैं। जिसकी वजह से बीजेपी शासित उत्तरी दिल्ली नगर निगम की छवि लगातार खराब होती जा रही है।