शिक्षित किंतु कमजोर होता समाज


 प्रसिद्ध समाजशास्त्री आर. एम. मैकाइवर एवं एच.सी.पेज का कथन है, "समाज सामाजिक संबंधों का जाल है"  अर्थात समाज व्यक्तियों का समूह या झुण्ड न होकर उनमें पाया जाने वाला पारस्परिक अंतर संबंध है। यह संबंध व्यक्ति का व्यक्ति के बीच ,व्यक्ति का समूह  के बीच तथा समूह का समूह के बीच हो सकता है। इस तरह के अंतर संबंधों से जुड़ा हुआ व्यक्ति जब अपनी क्रियाओं का आदान प्रदान करता है ,तब सामाजिक संबंधों का सृजन होता है। यह सामाजिक संबंध व्यक्ति को न सिर्फ शारीरिक और मानसिक रूप से संबल प्रदान करते हैं, बल्कि उसका जीवन पथ भी सुगम बनाते हैं।
     गांवों में बसा भारत आज भी अंतर संबंधों की सुगंध बिखेर रहा है। आज लगभग हर किसी के हाथ में फोन और इंटरनेट सेवा है । सूचना का आदान प्रदान बड़ी सरलता से दुनिया के किसी भी कोने में संभव है । दृष्टि डालते हैं कुछ समय पूर्व उस शिक्षित या अर्ध शिक्षित समाज पर जब सूचना संप्रेषण का साधन पत्र हुआ करते थे ,और लोग दूर देश में रह रहे अपने प्रिय जनों की कुशलक्षेम जानने के लिए डाकिए बाबू का बड़ी उत्सुकता से इंतजार किया करते थे । पत्र वाहक से पत्र प्राप्त करके गांव में किसी शिक्षित के घर पर लगी चौपाल पर समाचार सुनकर सभी हर्ष की अनुभूति करते थे। किसी के घर में कोई विशिष्ट आयोजन होने पर सभी अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करते थे। अपनत्व भरा सहयोग पाकर व्यक्ति दुगने उत्साह से कार्य का निष्पादन करता था। साथ ही एक दूसरे के सुख दुख का साझीदार बन कर उसे सुदृढ़ता प्रदान करता था। हमारा कार्य व्यवहार ही हमारा जीवन दर्शन था। 
   भारत की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक वैशिष्ट्य व शिक्षा पद्धति एक दूसरे को जोड़ने वाली थी। जिसे देखकर लॉर्ड मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद के समक्ष दिए गए उद्बोधन में कहा था मैंने भारत की चतुर्दिक यात्रा की और एक भी ऐसा आदमी नहीं देखा जो भिख मंगा हो या चोर हो, यहां के उच्च नैतिक मूल्य, उच्च क्षमतावान व्यक्ति, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत तथा शिक्षा प्रणाली यहां की रीढ़ की हड्डी है और जब तक हम इसे तोड़ नहीं देते तब तक इस देश को जीत नहीं सकेंगे।
      कालक्रम में वही हुआ, हम विदेशी शिक्षा और संस्कृति के दास बन गए हैं। शिक्षा के तीनों स्तंभ अर्थात उचित शिक्षा, शिक्षक और विद्यार्थी में जीवन मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है। अपनी गौरवमई संस्कृति और उच्च आदर्शो से हम दिन प्रतिदिन विमुख हो रहे हैं । उच्च और तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर वैज्ञानिक दृष्टि से समुन्नत हो रहे हैं, किंतु सांस्कृतिक और संस्कारित दृष्टि से विपन्न हो रहे है। हम चांद तारों की ऊंचाई और समुद्र की गहराई मापने में सफल हुए हैं, लेकिन मानव मन के भावों को पढ़ने में असफल हैं। हमारा मस्तिष्क पक्ष बड़ा ही उर्वर और समृद्ध है, पर हृदय पक्ष बंजर और विपन्न होता जा रहा है। जिसका परिणाम तनाव, व्यग्रता, भय, कुंठा और अवसाद के रूप में हमारे सामने आ रहा है। 
      तकनीकी रूप से समृद्ध होकर संपूर्ण विश्व को हमने एक गांव बना लिया है, वही संवेदनाओं से क्षीण होकर अपने गांव, परिवार और समाज से दूरी बन गई है। विकास के उन्माद ने रिश्तो पर घातक प्रहार किया। जहाँ संयुक्त परिवार अप्रिय परिस्थितियों में मजबूत चट्टान बनकर संबल प्रदान किया करता था। वहीं परिवार के बड़े बुजुर्गों की छत्रछाया में बच्चों का न सिर्फ सम्यक विकास होता था, अपितु उनके प्रेरणादाई वचनों व अनुभव के उद्धरणों से मूल्योन्मुखी  शिक्षा बाल्यकाल में अनायास ही मिल जाया करती थी। 
       आज हम एकाकी परिवार और एकाकी जीवन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। जहां भौतिक विकास के बहुत से अवसर हैं, किंतु भावनात्मक विकास शून्य है। व्यक्ति के आसपास बहुत सारे लोग होने के बावजूद भावनात्मक रिश्तो के अभाव में मन में उदासीनता, सूनापन और निराशा है। बौद्धिकता और तार्किकता ने मन के कोमल तंतुओं को नष्ट कर दिया है । वर्तमान संदर्भ में डॉ राधाकृष्णन का कथन सर्वथा समीचीन है, आधुनिक युग आध्यात्मिक खोखलेपन, नैतिक विमूढ़ता तथा सामाजिक अराजकता का युग है। इतना ही नहीं वह तो इसे आर्थिक और बौद्धिक नृशंसता का युग भी कहते हैं। 
      वर्तमान में जैसे जैसे शिक्षित लोगों की संख्या में वृद्धि हो रही है, वैसे-वैसे संस्कारों का पतन हो रहा है। दहेज प्रथा, दहेज हत्या, गर्भ में ही लिंग की जांच करवा कर कन्या भ्रूण की निर्ममता से हत्या तथा बलात्कार से मानवता शर्मसार है । उचित संस्कारों के अभाव में उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त व्यक्ति समाज की विघटनकारी शक्तियों में संलग्न है। आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अनुचित साधनों से धनोंपार्जंन तथा धनोपार्जन हेतु घर परिवार से दूर जाने से समाज व परिवार कमजोर पड़ रहा है। साथ ही जिन उच्च शिक्षित व्यक्तियों को उनकी योग्यता अनुसार रोजगार नहीं मिल पा रहा है, वह भी विद्ध्वंशक् गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं।
       
      शिक्षा मानव जीवन के उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती है । इसीलिए इसे मनुष्य का तीसरा नेत्र माना गया है। विवेकयुक्त शिक्षा से मनुष्य सभ्य, सुसंस्कृत एवं बुद्धिजीवी होता है। स्वामी विवेकानंद ने मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना शिक्षा माना है। वही प्लेटो का वक्तव्य है ,शिक्षा का कार्य मनुष्य के शरीर और आत्मा को वह पूर्णता प्रदान करना है, जिसके वह योग्य है। इस प्रकार भारतीय शिक्षा का स्वरूप सर्वथा कल्याणकारी है। वेदांत में भी कहा गया है" सा विद्या या विमुक्तए" अर्थात शिक्षा वह है जो विमुक्त करें। यह जहां अज्ञानता और स्वार्थपरता से छुटकारा प्रदान करती है तथा सामाजिक रूप से जागरूक इंसान बनाती है ,किंतु यह हमारा मात्र आदर्श है । व्यवहारिक रूप से अन्वेषण करने पर हम पाते हैं, शिक्षित और ज्ञानियों ने भी स्वार्थ वश अनुचित और अमर्यादित कार्य किए हैं। 
     वर्तमान में शिक्षा का स्वरूप वृतात्मक है। संस्कारात्मक नहीं। इसका उद्देश्य डिग्री प्रदान करना है। न कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास करना। यह केवल आजीविका प्राप्त करने का साधन है । यह एक दूसरे से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करने वाली है । इस अशांति, अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति से मुक्ति पाने के लिए आत्मान: प्रतिकूलानि परेशाम न समाचरेत " अर्थात जो कृत्य हमारे लिए प्रतिकूल हो उसे दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए। के आदर्श को आत्मसात करना होगा। "येन केन प्रकारेण" आगे निकलने की होड़ की नीति का परित्याग करना होगा।वर्तमान शिक्षा प्रणाली में विद्या को समावेशित करने की आवश्यकता है। जो छात्रों को जीवन जीने की कला, जीवन का प्रबंधन करना सिखायेगी। इसी ज्ञान से  जीवन की दशा में परिष्कार होगा और जीने की सही राह मिलेगी। जीवन की सम्पूर्ण दृश्य, अदृश्य शक्तियों का विकास करके निर्मित संस्कारी व्यक्तित्व सभी के लिए अनुकरणीय होता है।  ह्रदय पक्ष को पुष्ट करके बुद्धि को उसका अनुगामी बनाकर, संस्कारों से पोषित व्यक्तित्व ,जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल सकता है । यही शिक्षा सम्यक शिक्षा हो सकती है जो समाज को मजबूत करेगी।
लेखक: डॉ कामिनी वर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर इतिहास, काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ज्ञानपुर ,भदोही