आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी आंदोलन


कहते हैं आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है और यही आवश्यकता आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त करती है। वर्ष भर पूर्व समस्त विश्व को संक्रमित करने वाले कोविड-19 वायरस के भय से विश्व भर की गतिशीलता स्थिर हो गई। वायरस का संक्रमण इतना बढ़ा कि बीमारों के लिए अस्पताल कम पड़ गए ऐसे समय में रेल पथ पर खड़ी रेल अस्पताल बन गई। जिस वैक्सीन की खोज में 5-6 साल लग जाते उसे सीरम इंडिया एवं बायोटेक द्वारा कोविड-19 से दो-दो हाथ करने के लिए मात्र 10 महीने में न सिर्फ खोज लिया अपितु इस स्वदेशी वैक्सीन का वृहद स्तर पर उत्पादन करके विदेशों को भी निर्यात किया गया।
      आत्मनिर्भर भारत आज न सिर्फ चर्चा का विषय बना हुआ है बल्कि इस दिशा में सरकारी और निजी स्तर पर व्यापक प्रयास भी किए जा रहे हैं। इसी क्रम में युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना संचालित है, जो युवाओं को उनके हुनर व कार्य क्षमता के आधार पर प्रशिक्षित करके स्वरोजगार के लिए तैयार करती है। 2015 में आरंभ स्किल इंडिया मिशन का उद्देश्य भी युवाओं को नवीन तकनीकों पर आधारित कौशल का प्रशिक्षण देकर रोजगार के योग्य बनाना था। आत्मनिर्भरता की दिशा में यह एक सराहनीय प्रयास है।
  औपनिवेशिक भारत पर दृष्टि डालें तो 1915 में वायसराय कर्जन द्वारा किए गए बंगाल विभाजन के विरोध में संपूर्ण भारत में स्वदेशी आंदोलन ने आत्मनिर्भरता की अलख जगाई। विदेशी वस्तुओं, नौकरियों, पदवियों और शिक्षा को त्यागकर स्वदेशी को अपनाया गया। स्वावलंबन और रचनात्मक कार्यों को प्रोत्साहन दिया गया। स्वदेशी शिक्षा का विकास किया गया। स्वदेशी उद्योग आरंभ किए गए। 8 नवंबर 1905 को बंगाल के प्रथम राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना हुई। 14 अगस्त 1906 को बंगाल नेशनल स्कूल और कॉलेज स्थापित हुआ 1906 में ही बंगाल टेक्निकल स्कूल खुला।
     औद्योगिक क्षेत्र में भारतीय उद्योगों की विकास गति यद्यपि धीमी थी फिर भी कपास और पटसन उद्योग विकसित हुए। 1906 में बंग लक्ष्मी कॉटन मिल और 1906 में टाटा आयरन और स्टील कंपनी का निर्माण भारतीय पूंजी के द्वारा हुआ। 1910 के उत्तरार्ध में टाटा हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर सप्लाई कंपनी देशी पूंजी से स्थापित हुई। भारी उद्योगों में लघु उद्योगों में कोलकाता चीनी मिट्टी बर्तन उद्योग, दियासलाई का कारखाना खोला गया। जनसेवा की भावना से प्रेरित युवा जमींदार राजेंद्र नाथ मुखर्जी ने उत्तरपारा में देशी धोती हाट खोला। मार्च 1905 में मझिलपुर जय-नगर हितैषिणी सभा ने महिला स्वदेशी मेला आयोजित किया। समय-समय पर आयोजित होने वाले मेले और प्रदर्शनी से स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की भावना का जन-जन में प्रसार हुआ। गांधीजी के चरखे और करघे ने स्वावलंबन के क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया। आज हम लोकल से वोकल या नवाचार, नवप्रवर्तन का प्रयोग कर आत्मनिर्भरता की बात करते हैं, उसका बीज वपन औपनिवेशिक काल में ही खो गया था और प्राचीन काल से ही भारत भारत आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में अग्रणी रहा है।
लेखक: डॉ कामिनी वर्मा एसोसिएट प्रोफेसर इतिहास काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ज्ञानपुर भदोही,(उत्तर प्रदेश)

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